भारत भूमि

हे ! भारत भूमि तुझ पर मेरा यह शीश निछावर है ,
तेरा कल्याण चाहूँ , तो मुझे तेरा पुत्र कहता कायर है !

कब मैंने चाहा कि मैला हो तेरा आँचल ?
तेरी प्रगति ,तेरा उत्थान चाहा प्रतिपल।

तू माँ है , क्या चाहेगी अपने ही पुत्रों में झगड़ा ?
ग़ैर ने अपमान किया , तो भी तेरा क्या बिगड़ा।

तू तो है विशाल ह्रदय ,सबको संभालती ,
सबको पिलाती दूध तेरी , मेरी माँ छाती।

अब निकले हैं लोग , माँ जो तुझे हैं बाँटते ,
क्या आप करोगी शर्म उन्हें इसके लिए डाँटते?

मैं तेरा पुत्र हूँ , सशंकित और भ्रमित हूँ ,
कर्त्तव्य को नहीं जानता कदाचित हूँ।

माँ , करो मेरे ऊपर यह उपकार ,
कर्त्तव्य का ज्ञान दो , मेरा आभार।

पुत्र , माना की सभी मेरे हैं ,
परंतु ,दुर्दिन मुझे घेरे हैं।

मेरे ही पुत्र चाहते अलग पिता ,
ऐसा तो मैं लगाती अभी चिता।

जो अपने पिता को हैं पहचानते ,
अन्य पुत्र नहीं उनको हैं मानते।

पुत्र ! अनेकों बार हुआ मेरा वस्त्र हरण ,
यह न देख ,मेरे पुत्र कहते किस कारण ?

माँ क्या व्याख्या दे ?कैसे समझाए ?
कुतर्कों से हैं मेरे पुत्र भरमाए।

तू भी तो मेरे पुत्र कुतर्क करता है ,
माँ को छोड़ बुद्धि पर मरता है।

माँ , मुझे नहीं पता कैसे करूं तेरा मैं सम्मान ?
बुद्धि का प्रयोग न करूँ तो मनुजत्व का अपमान।

सच बतला क्या मात्र हिन्दू हैं तेरे ?
नहीं , बेटा सब मानव हैं मेरे।

फिर क्या संशय और क्या फिर बात ,
हिन्दू नहीं जो ,लूटते तेरी माँ दिन रात।

माँ , आदेश दे , क्या मेरा कर्त्तव्य ?
तू स्वयं चुन क्या मैं दूं वक्तव्य ?

यह तो माँ कोई बात न हुई ,
माँ हूँ, कैसे चुभाऊं तुझे सुई ?

नहीं माँ , यूँ मुझे न करो तिरस्कृत ,
नहीं मैं जी पाऊंगा यूँ अपमानित।

तो सुन , मेरा मान धर , मेरा मान धर ,
लड़ चाहे बेशक तेर भाई जाएं मर।

उनकी मृत्यु पर न मैं करूंगी शोक ,
माँ का अपमान करे ! तू उन्हें रोक।

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