मेरी आस्था

मेरे कुछ प्रिय मित्रों ने मुझसे पूछा की आखिर मेरी क्या मान्यता है। मैं किसके साथ हूँ। उन्होंने कहा की कभी मैं हिन्दू धर्म की प्रसंशा करता हूँ , कभी इस्लाम की। फिर कभी हिन्दू के विरूद्ध लिखता हूँ तो कभी इस्लाम के। कभी मैं हिन्दू राष्ट्रवादियों की भाषा बोलता हूँ , तो कभी साम्यवादियों की। कभी मैं मानवतावादी बातें करता हूँ तो कभी राष्ट्रवाद की , इत्यादि -इत्यादि।

मैं सत्य और न्याय के साथ हूँ। मेरी श्रद्धा और आस्था मात्र सत्य के साथ है। क्योंकि मैं अपने अनुभव और अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि मात्र सत्य ही जगत का आधार है। सत्य पक्षपात नहीं कर सकता। सत्य सूर्य है , सत्य सागर है , सत्य ईश्वर है। हाँ , यह संभव है की सत्य के मापदंड और परिभाषा सार्वभौमिक नहीं है। व्यक्तिगत दुराग्रह सत्य के सूर्य को बादल की तरह ढक सकते हैं , परंतु मुझे पूर्ण विश्वास है की सूर्य को बादल कुछ काल के लिए ढक सकते हैं , सदैव नहीं। और यदि मन में पूर्वाग्रह न हों तो सत्य का सूर्य कभी भी ग्रहण का शिकार नहीं हो सकता।

जितनी भी विचारधाराएं जगत में हैं ,वे सभी लोग जो उन विचारधाराओं के मानने वाले हैं, पुर्वाग्रह से ग्रसित हैं। यह उनकी विवशता है की अपनी विचारधारा के ऋणात्मक पक्ष को स्वीकार नहीं कर सकते। अतएव वे लोग अपनी कमियों को न्यायसंगत सिद्ध करने में ही अपना गौरव समझते हैं। यह स्पष्ट विवशता है, क्योंकि एक बार जिस विचार को अपना लिया उसकी रक्षा न कर पाना मनुष्य को अपनी बुद्धि का अपमान प्रतीत होता है , मनुष्य को लगता है की मैं इतना मूर्ख कैसे की गलत बात को स्वीकार करूँ? इसलिए गलत को सही सिद्ध करने में ही ये पूर्वाग्रही अपना समय और ऊर्जा व्यर्थ करते रहते हैं। यह सत्य है की गलत और सही का फैसला इतना आसान नहीं , ‘ग्रे ‘ के अनेक रंग हैं , परंतु स्पष्ट रूप में दिखने वाले काले को सफ़ेद तो नहीं कहा जा सकता न ! ये जानते हुए भी , समझते हुए भी की यह काला है , उसे सफ़ेद कहने के लिए तर्क करने को न्यायसंगत तो नहीं कहा जा सकता न ! प्रत्येक संस्कृति में , प्रत्येक धर्म में , प्रत्येक राष्ट्र में , प्रत्येक विचारधारा में ,प्रत्येक व्यक्ति में सफ़ेद और काले दोनों रंग विद्यमान हैं। मनुष्य का धर्म है की वह इन दोनों को स्वीकार और काले को सफ़ेद करने की कोशिश करे। कितना अच्छा होता ! की मनुष्य सभी के सद्गुणों को लेता और बढ़ता ,परंतु दुर्भाग्य ! सभी एक दूसरे से डरे हुए हैं , सभी को लगता है की यदि मैंने समझौता किया तो अन्य जीत जाएगा।

मैंने प्रभु कृपा से इस सूर्य को ढकने वाले बादल को वाष्पीभूत कर दिया है, मुझे सब अपने लगते हैं। हिंदुयों ने सर्वश्रेष्ठ दर्शन को जन्मा इसलिए मैं उसकी प्रसंशा करता हूँ , वहीं सामाजिक भेदभाव और स्त्रियों के अधिकार को लेकर हिन्दू व्यवहारिक जीवन में असफल रहे ,इसके लिए मैं हिंदुयों की आलोचना करता हूँ। इस्लाम ने अपने मूल सिद्धान्त में अपने समाज में भाईचारे और सहयोग का जो सिद्धान्त अनुकरणीय है। अनाथ के लिए , गरीब के लिए , सामजिक समरसता के लिए इस्लामी दर्शन अनुकरणीय है। इस्लाम जब काफ़िर को मारने की बात करता वह स्वीकार मुझे नहीं , फिर मुझे मंसूर , सरमद और बुल्लेशाह याद आ जाते हैं ,तो मेरा ह्रदय आदर से इन सूफियों के सामने झुक जाता है। वाम पंथी जब यह कहते हैं की प्रत्येक मनुष्य समान है , तो कौन इसे न स्वीकारेगा ? पर जब स्टालिन याद आता है ,भारत के वामपंथी याद आते हैं तो क्रोध उत्पन्न होता है। हिन्दू राष्ट्रवादी जब राष्ट्र हिट की बात करते हैं तो मुझे अति आनंद होता है , लेकिन जब ये लोग मुझे दुराग्रही नजर आते हैं तो मुझे रोष होता है।

मैं इन सबके साथ हूँ , परंतु किसी के भी दुराग्रही पूर्वाग्रह के साथ नहीं। सत्य से बढ़कर कुछ नहीं। सत्य ही धर्म है , सत्य ही ईश्वर है , सत्य ही आप हो ,मैं हूँ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *