भारत और जातिवाद

मैं आग्रह पूर्वक कह रहा हूँ। जितना मेरा अध्ययन है ,उस पर आधारित समझ के अनुसार कह रहा हूँ। यह कहना यद्यपि अहंकार की बात होगी , परंतु यह सत्य है की पिछले ४ साल में मैंने धर्म , दर्शन और संस्कृतियों का विशद अध्ययन किया है। और उसी अध्ययन तथा अपने अनुभव को आधार बना मैं कहता हूँ कि यदि भारत को फिर से वैभवशाली बनना है और एक उदाहरण बनकर विश्व के समक्ष उपस्थित होना है तो , भारत को जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी जातिवाद के नरक से बाहर आना होगा। मैं जनता हूँ की यह कठिन कार्य है , परंतु दुःसाध्य नहीं है। यह किया जा सकता ,यह संभव है। जितनी ऊर्जा हिन्दू संगठन इस्लाम के विरूद्ध लगाते हैं ,यदि उसकी आधी भी ऊर्जा इस दिशा में लगाई जाए तो यह कार्य संपन्न हो सकता है।

हिन्दू दर्शन अद्भुत और महान है। जितनी ऊंची बातें हिंदुयों ने सोची और कहीं उतनी ऊंची बाते कोई और सभ्यता न कह सकी। जो बातें हिन्दू दार्शनिकों ने हज़ार साल पहले कहीं आज वह बातें पश्चिम के दार्शनिक तथा वैज्ञानिक कह रहे हैं , वह भी तुतलाकर। ऐसी दिव्य और महान संस्कृति पराजित हुई , गुलाम बनी यह भारत ही नहीं समस्त मानवता की हानि हुई। परंतु हानि को अभी भी पूर्ण किया जा सकता है। केवल एक कलंक है जो अनजाने ,बिना इरादे के इस संस्कृति मैं घुस गया। और वह है जन्म के आधार पर वर्ण का विभाजन। यह जहर इतने गहरे चला गया कि २१ वी शताब्दी में भी उत्तर नहीं रहा। इस जहर को निकालना होगा।

और इस जहर को निकालने एकमात्र तरीका है अंतर्जातीय विवाहों की पहल सवर्ण समाज करे। उच्च वर्ण आगे बढ़कर खुद अपनी बेटियों का विवाह तथाकथित निम्न वर्ण में करें। यही एकमात्र उद्देश्य समझें की यदि ऐसा कर पाए तो मानो अपने धर्म के प्रति अपने ऋण से मुक्त हो गए , भगवान् पाने के तुल्य इस महान कार्य को समझें , आज के समय में इसे महान यज्ञ समझें।

दलित में बहुत बड़ा वर्ग बाबा साहेब आंबेडकर और बुद्ध का अनुयायी हो गया है। यह वर्ग इतना आक्रोशित है कि हिन्दू को पराजित करने के लिए किसी साथ जाने को तैयार है। इनको रोकने लिए आवश्यक है की हिन्दू मंदिरों में बुद्ध की पूजा उसी श्रद्धा तथा गर्व से हो जैसे राम और कृष्ण की होती है। स्वयं हिंदुयों ने बेशक मजबूरी में ही , बुद्ध को नवम अवतार घोषित किया है। बुद्ध जब हिन्दू के नवीनतम अवतार हैं तो क्युओं नहीं उनकी एक भी मूर्ति हिन्दू मन्दिरों में स्थापित होती ? हिंदुयों को यह दोगलापन छोड़ना होगा और खुले दिल से बुद्ध को कृष्ण के तुल्य मानना होगा। जैसे शिव के साथ हम नंदी की मूरत रखते हैं वैसे ही बुद्ध के साथ बाबा साहेब की भी एक मूर्ति जाए तो इन जाली अम्बेडकरवादियों के पास दलितों को बरगलाने का कोई मार्ग शेष न रहेगा।

यह समय की आवश्यकता है। इतिहास साक्षी है की समय और परिस्तिथि के अनुरूप सनातन धर्म ने स्वयं को समायोजित किया है। इसी आवश्यकता के तहत हिन्दू धर्म ने अपने धुर विरोधी बुद्ध को भी अपना नवम अवतार तक घोषित किया। ये परिवर्तन जो मैंने लिखे हैं जितनी शीघ्र प्रयुक्त हों उत्तम हैं।

सुधी जान अपने विचार पर अवश्य प्रकट करेंगे ऐसी मेरी आशा है।

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